बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह: जब श्री बाबू ने कहा, विधायक बन गए हो पर पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ना
बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह: जब श्री बाबू ने कहा, विधायक बन गए हो पर पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ना
अरुण साथी द्वारा जयंती पर विशेष
बिहार केसरी डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर बिहार और देशभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया जा रहा है। उनसे जुड़ी कुछ यादें, जिन्हें लोगों ने संजो कर रखा है, बेहद प्रेरणादायी हैं और उनके विशाल व्यक्तित्व को चित्रित करती हैं। बरबीघा से कई बार विधायक और बिहार के मंत्री रहे स्व डॉ. महावीर चौधरी अपने एक संस्मरण में लिखते हैं कि बिहार केसरी डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह से उनकी प्रथम मुलाकात जून-जुलाई 1951 में हुई थी। उस समय वह पटना विश्वविद्यालय में एम.ए. और वकालत के छात्र थे। अनुग्रह बाबू से मिलने के बाद उन्होंने बिहार केसरी से मिलने के लिए प्रेरित किया।

वे लिखते हैं कि श्री बाबू से मिलने के लिए वह सर्कुलर रोड स्थित मुख्यमंत्री आवास गए। बातचीत से श्री बाबू काफी प्रसन्न हुए और बोले कि गया लोकसभा सीट से टिकट मिल जाएगा। सच में, कांग्रेस पार्लियामेंट कमेटी द्वारा गया संसदीय क्षेत्र से उनका नाम दिल्ली भेज दिया गया। हालांकि, पटना सिटी के रामधनी दास नामक एक डोम जाति के उम्मीदवार पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले और देश में डोम जाति का कोई उम्मीदवार न होने की बात कहकर उन्हें प्रेरित किया, जिस वजह से उनका टिकट कट गया। बाद में बिहार केसरी ने उन्हें रजौली-वजीरगंज विधानसभा क्षेत्र से 1952 में कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया और वह वहां से भारी बहुमत से जीतकर आए।
महावीर चौधरी अपने संस्मरण में आगे लिखते हैं, "जब मैं जीत के बाद उनसे आशीर्वाद लेने गया तो उन्होंने कहा कि देखो महावीर, राजनीति में आ गए हो और विधायक बन गए हो, लेकिन पढ़ाई-लिखाई मत छोड़ना।" उनके आदेशानुसार उन्होंने विधायक रहते हुए भी एम.ए. और वकालत की पढ़ाई जारी रखी।
पठन-पाठन से जुड़ा एक और संस्मरण साझा करते हुए डॉ. महावीर चौधरी लिखते हैं कि राजनीति विज्ञान में उनका विशेष विषय 'लोक प्रशासन' था। लोक प्रशासन पर एक अमेरिकी लेखक सी. ब्राउन द्वारा लिखी गई किताब पटना विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभागाध्यक्ष वी.के.एन. मेनन पढ़ाते थे। इस किताब से उन्हें परीक्षा की तैयारी करनी थी, परंतु वह पुस्तक पटना में कहीं नहीं मिल रही थी। किसी ने बताया कि श्री बाबू के पुस्तकालय में वह किताब मिल जाएगी।
जब वे श्री बाबू के पास गए और बताया कि यह किताब सिन्हा लाइब्रेरी, खुदा बख्श लाइब्रेरी और पटना की अन्य सभी लाइब्रेरी में खोज चुका हूँ पर कहीं नहीं मिली, तब श्री बाबू ने तुरंत बताया कि अमुक अलमारी के तीसरे दराज में पाँचवीं किताब वही है। साथ ही उन्होंने कहा, "पढ़कर मुझे वापस लौटा देना।" वे यह भी बताते हैं कि अनुसूचित जाति की समस्याओं के सिलसिले में जब भी वे श्री बाबू से मिले, उन्होंने हमेशा समस्याओं को ध्यानपूर्वक सुना और उनके त्वरित समाधान हेतु संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
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