• Sunday, 18 October 2026
रिज़ीम चेंज के नारे के जाल में कैसे फंस गई कॉकरोच जनता पार्टी?

रिज़ीम चेंज के नारे के जाल में कैसे फंस गई कॉकरोच जनता पार्टी?

Vikas

रिज़ीम चेंज के नारे के जाल में कैसे फंस गई कॉकरोच जनता पार्टी?

 

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के उभार से लेकर सत्ता परिवर्तन के नारे तक की कहानी कई घटनाओं से होकर गुजरती है। इस पूरे घटनाक्रम में बेरोजगारी, छात्र आंदोलन, चुनाव आयोग, विपक्षी राजनीति और अंततः सत्ता परिवर्तन की मांग एक-दूसरे से जुड़ती चली गईं। लेकिन जिस आंदोलन की शुरुआत जनसरोकारों के मुद्दों से हुई थी, वह अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के भंवर में फंसता दिखाई दे रहा है।

 

कॉकरोच जनता पार्टी के जन्म की कहानी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी से जुड़ी बताई जाती है। वकीलों की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि कुछ बेरोजगार लोग कार्यकर्ता और सोशल मीडिया पत्रकार बन जाते हैं। ऐसे लोगों की तुलना कॉकरोच से किए जाने संबंधी टिप्पणी के बाद इंस्टाग्राम पर कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से एक मंच उभरा। इस मंच के माध्यम से यह प्रचारित किया गया कि मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगारों को कॉकरोच कहा है। इस विवाद ने सोशल मीडिया पर तेजी से ध्यान खींचा और मंच के अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी।

 

इसके बाद नीट परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने का मामला सामने आया तो कॉकरोच जनता पार्टी ने इसे भी अपने अभियान का हिस्सा बनाया। अमेरिका के बोस्टन में पढ़ाई कर रहे अभिजीत दीपके दिल्ली आने और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगने के बाद आंदोलन ने नया मोड़ लिया। प्रदर्शन की अवधि और अनुमति को लेकर विवाद बढ़ा। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की खबरें सामने आईं और कुछ लोगों के घायल होने की बात भी कही गई।

 

धीरे-धीरे इस मंच की गतिविधियां शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों तक पहुंचीं। पंजाब के सरकारी स्कूलों की बेहतर स्थिति और उत्तर प्रदेश के स्कूलों की बदहाल स्थिति को सामने रखकर शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए। इसी दौरान आम आदमी पार्टी के साथ कॉकरोच जनता पार्टी के कथित संबंधों को लेकर भी चर्चा होने लगी।

 

इसके बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों को लेकर विवाद तेज हुआ। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों से जुड़े ईमेल और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए जाने के बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे पर आंदोलन शुरू किया। वामपंथी संगठनों और अन्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता से मामला और व्यापक होता गया। चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन और इस्तीफे की मांग के बीच कॉकरोच जनता पार्टी के नेता भी सक्रिय रहे।

 

10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन को पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बीच रोकने का प्रयास किया गया। इस दौरान कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े अभिजीत, आशुतोष और सौरभ सहित कुछ लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई। छात्र नेता नेहा बोरा को भी हिरासत में लिया गया। बाद में संबंधित नेताओं को अदालत में पेश किया गया। उनके द्वारा शांति बनाए रखने से संबंधित बंधपत्र दिए जाने की जानकारी भी सामने आई। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर आंदोलन की गतिविधियों को रोकने के लिए कार्रवाई की।

 

हालांकि, आंदोलनकारी दोबारा वहां पहुंचने और तिरंगा लहराकर विरोध दर्ज कराने का प्रयास करते रहे। इस क्रम में आशुतोष और सौरभ की गिरफ्तारी का मामला भी चर्चा में आया। तिरंगा लहराने के कारण गिरफ्तारी किए जाने के आरोप को लेकर विवाद बढ़ा और 16 अक्टूबर को तिरंगा लहराओ अभियान की घोषणा की गई। पुलिस की भारी मौजूदगी के बीच इस अभियान का प्रभाव सीमित रहा, हालांकि कुछ लोग सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करते दिखाई दिए।

 

इसी बीच दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित एक प्रेस वार्ता ने पूरे विवाद को नया आयाम दे दिया। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कथित तौर पर खुले तौर पर कहा कि वह रिज़ीम चेंज चाहते हैं। इस प्रेस वार्ता में कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े नेताओं की मौजूदगी ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया।

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वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा की ओर से बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन को क्रांति बताए जाने और वहां के सत्ता परिवर्तन से जुड़े एक नेता द्वारा उनके आंदोलन का समर्थन किए जाने की चर्चा ने भी विवाद को हवा दी। आलोचकों ने इन घटनाओं को भारत में अस्थिरता पैदा करने की आशंका से जोड़ना शुरू कर दिया। इसी बीच कांग्रेस के विदेश मामलों से जुड़े नेता सैम पित्रोदा की ओर से कथित तौर पर सत्ता परिवर्तन की बात कहे जाने के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गए।

 

राहुल गांधी पहले से ही चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं। चुनाव प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर विपक्ष की आलोचना के बीच सर्वोच्च न्यायालय को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हुई। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उस पर दबाव बनाने के आरोपों के बीच अदालत की ओर से भी यह संदेश दिया गया कि उसे डराया नहीं जा सकता।

 

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सत्ता परिवर्तन की मांग को लेकर पैदा हुआ विवाद है। विपक्ष के कुछ नेताओं की ओर से इसे चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने की मांग बताया जा रहा है, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश के रूप में पेश कर रहे हैं।

 

यहीं से कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी होती दिखाई देती है। बेरोजगारी, परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा जैसे जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर शुरू हुआ अभियान अब सत्ता परिवर्तन की बहस में उलझ गया है। आम लोगों के बीच आंदोलन की छवि को लेकर भ्रम पैदा होने की आशंका है। भारतीय जनता पार्टी भी इस विवाद को विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बना रही है।

 

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कॉकरोच जनता पार्टी अपने मूल जनसरोकारों पर ध्यान केंद्रित कर पाएगी या सत्ता परिवर्तन के विवाद में उलझकर अपना जनसमर्थन खो देगी? फिलहाल घटनाक्रम यही संकेत देता है कि आंदोलन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक छवि और जनविश्वास को बनाए रखने की है।

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