जब भरी सभा में फूट फूट कर रोने लगे थे मुख्यमंत्री: डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर विशेष
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह कितने दूरदर्शी थे और पूरे बिहार के प्रति उनके मन में कितनी चिंता थी, इसे इस संस्मरण से समझा जा सकता है। यह संस्मरण तत्कालीन बरबीघा प्रखंड के प्रमुख रामनरेश सिंह ने लिखा है। 2003 में बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 116वीं जयंती पर तत्कालीन विधायक अशोक चौधरी द्वारा प्रकाशित स्मारिका में रामनरेश सिंह लिखते हैं कि 1951 में उनके गाँव मालदह में माध्यमिक विद्यालय के भवन के शिलान्यास के क्रम में मुख्यमंत्री का आगमन हुआ था।

अपने संबोधन के दौरान अचानक श्री बाबू मौन धारण कर लेते हैं और उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगती है। कुछ देर रुकने के बाद वे तुलसीदास जी की यह चौपाई सुनाते हैं, "तुलसी वहाँ न जाइए जहाँ जन्म स्थान...।" इसके माध्यम से उन्होंने अपने वक्तव्य को आगे बढ़ाया। पूरी सभा में एक मार्मिक दृश्य उपस्थित हो गया; लोग रो रहे थे और मैं भी रो रहा था। उस समय अपनी अपरिपक्व अवस्था के कारण उनकी रुलाई के सही कारण की जानकारी मुझे नहीं हो पाई थी। वे आंसू बहा रहे थे, लोग आंसू बहा रहे थे, और मेरी आँखों से भी आंसू बह रहे थे—चारों ओर केवल आंसुओं का ही आलम था। लेकिन आज जब मैं उन आंसुओं की गहराई में उतरता हूँ और उनका मनन करता हूँ, तो पाता हूँ कि वह प्रेम और विवशता का एक गहरा सागर था।

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