बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?
बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?
अरुण साथी, पटना
डॉ श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर यह प्रश्न कई लोगों ने उठाया। उत्तर कहां है..?
तो उत्तर प्रश्न में ही निहित है। दरअसल, बिहार में भूमिहार (बहुसंख्यक) जमींदारों के विरुद्ध जमींदारी उन्मूलन कानून लाने वाले, दलित को देवघर मंदिर में प्रवेश कराने वाले, और अंग्रेजों के लोहा लेने वाले बिहार केसरी को जब हम भूमिहार जाति के सीमा में बांध दिए, उसी दिन इसकी संभावना मर गई। जो भी महापुरुष हुए, वे जातियों की विसंगतियों का खंडन किया। लड़ाई लड़ी। अपमनित हुए। बिहार केसरी के साथ भी यह हुआ।
अपने राजनीतिक लाभ के लिए कुछ नेताओं ने बिहार केसरी को भी इसी सीमा में बांध दिया। उनका स्वार्थ तो सध गया। बिहार केसरी पिछड़ गए।
यह क्षरण आंबेडकर, पटेल से लेकर सभी महापुरुषों के साथ हुआ है। और इसी में भारत रत्न का मामला छिपा है। श्री बाबू भूमिहार जाति से थे। सवर्ण सहित इस जाति को कल तक बीजेपी का कोर वोट माना जाता था। बीजेपी ने यूजीसी के बहाने, इस जाति सहित सवर्णों को आहिस्ते से किनारे लगा दिया। बिहार में बीजेपी शुरू से ही खुलकर जातिवाद राजनीति करती रही है। इसी में अति पिछड़ा वोट बैंक के हिसाब के कर्पूरी जी को भारत रत्न मिला। श्री बाबू का फाइल किनारे रख दिया। जब कभी जरूरत लगेगी, यह कार्ड भी खेला जाएगा। पर अभी कोई संभावना नहीं दिखती...
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